शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

50 साल में 4 बार से ज्यादा कोई नहीं जीता, सिलावट जीते तो बनेगा रिकॉर्ड

50 साल में 4 बार से ज्यादा कोई नहीं जीता, सिलावट जीते तो बनेगा रिकॉर्ड

(गीतेश द्विवेदी) मतदान के बाद कांग्रेस और भाजपा हार-जीत के दावे कर रहे हैं, पर सांवेर ऐसा क्षेत्र है, जहां अनुमान लगाना बेहद कठिन होता है। इसकी एक वजह ये है कि यहां अंतर बहुत ज्यादा नहीं रहता, इससे अंतिम राउंड तक प्रत्याशी मुकाबले में बने रहते हैं। वैसे सांवेर में ये पहला उपचुनाव नहीं है। इससे पहले दो बार यहां उपचुनाव हो चुके हैं और दोनाें ही बार कांग्रेस को जीत मिली है।

इसमें दिलचस्प बात ये है कि 13 साल पहले 2007 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस से जीतने वाले उम्मीदवार तुलसी सिलावट थे,जो इस बार उपचुनाव में भाजपा के प्रत्याशी हैं। कांग्रेस ने प्रेमचंद गुड्‌डू को उनके सामने चुनाव मैदान में उतारा है, वे भी 1996 में आलोट का उपचुनाव लड़ चुके हैं। हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। यानी दोनों ही प्रत्याशियों को उपचुनाव लड़ने का अनुभव है, भले ही एक के हिस्से में हार और दूसरे के हिस्से में जीत आई हो।

ये है दो उपचुनाव का आंकड़ा
सांवेर में पहला उपचुनाव 1970 में हुआ। तब कांग्रेस प्रत्याशी सज्जनसिंह विश्नार ने जनसंघ के बाबू गोविंद को मात्र 27 वोट से पराजित किया। विश्नार को 17299 वोट, जबकि गोविंद को 17222 वोट प्राप्त हुए।
दूसरा उपचुनाव पूर्व मंत्री प्रकाश सोनकर के निधन के कारण 2007 में हुआ। इसमें कांग्रेस ने सिलावट को मैदान में उतारा और उन्होंने भाजपा प्रत्याशी संतोष मालवीय को 9292 वोट से हराया। यह उनका सांवेर क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा जीत का अंतर है, अन्यथा वे ज्यादातर चुनाव 2900 से 4000 वोट के बीच ही जीते।

सिलावट के विस के 7 चुनाव, सातों सांवेर से लड़े, गुड्‌डू बदलते रहे क्षेत्र
सिलावट ने उज्जैन से एक बार लोकसभा चुनाव लड़ने के अलावा जितनी भी बार विधानसभा चुनाव लड़ा, सांवेर को ही चुना। 1985 में वे यहां से पहला चुनाव लड़े और जीते। उसे मिलाकर 7 बार चुनाव लड़ चुके हैं और ये उनका आठवां चुनाव है। चार बार वे जीते, तीन बार हारे। दो बार प्रकाश सोनकर और एक-एक बार संतोष मालवीय व राजेश सोनकर को हराया। गुड्‌डू सांवेर से दूसरी बार लड़ रहे। 1998 में पहली बार लड़े और प्रकाश सोनकर को 3444 वोट से हराया। राजनीतिक करियर में वे एक बार पार्षद, दो बार विधायक और एक बार सांसद रह चुके हैं। इसमें भी दिलचस्प ये है कि एक बार सांवेर तो दूसरी बार आलोट से विधायक बने। सांसद का चुनाव उज्जैन जाकर जीता।

ये संयोग भी... हैट्रिक भी नहीं बनी किसी की यहां

  • सांवेर से कोई भी नेता 4 बार से ज्यादा चुनाव नहीं जीता। प्रकाश सोनकर के अलावा सिलावट भी यहां से 4 बार जीत चुके हैं। अब जीते तो पांचवीं जीत होगी।
  • इस सीट पर किसी नेता की जीत की हैट्रिक नहीं बनी। 1990, 93 में प्रकाश सोनकर जीते, लेकिन 1998 में हार गए। सिलावट 2007 व 08 में दो बार लगातार जीते, पर 2013 में हार गए।
  • 2007 के उपचुनाव से ही तुलसी सिलावट की सांवेर में वापसी हुई थी। उन्होंने 1993 में यहां से आखिरी चुनाव लड़ा था, हारे तो 14 साल तक सांवेर से दूर रहे। कुछ ऐसी ही स्थिति प्रेमचंद गुड्‌डू की है। 1998 में एक बार जीतने के बाद वे 22 साल बाद सांवेर लौटे हैं। जरिया उनका भी उपचुनाव ही बना है।
  • दोनों ने ही राजनीतिक करियर की शुरुआत 1983 में पार्षद का चुनाव लड़ने से की थी। तब गुड्‌डू निर्दलीय मैदान में उतरे थे, जबकि सिलावट कांग्रेस के टिकट पर। इसमें सिलावट जीते, गुड्‌डू हार गए थे।
  • 30 साल में यह दूसरा मौका जब भाजपा से सोनकर परिवार का कोई प्रत्याशी नहीं है। इससे पहले 2007 के उपचुनाव में भाजपा ने संतोष मालवीय को मैदान में उतारा था।


प्रतीकात्मक फोटो




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