अभी तक जिले में 13 हजार 200 रजिस्ट्रेशन कराया है। इनमें से बिहार, मध्य प्रदेश, यूपी, दिल्ली और जम्मू के लिए ट्रेनों और बसों से 11 हजार श्रमिक भेजे जा चुके हैं। जिले में अधिकतर श्रमिक रबी की फसल की कटाई के लिए हर साल मार्च की शुरू से लेकर मध्य तक आते हैं तथा मई की शुरूआत तक लौट जाते हैं। जिले में बड़ी फैक्ट्रियां नहीं होने के कारण बाहर की लेबर की आवश्यकता नहीं होती।
क्रेशर जोन में से लगभग 70 फीसदी श्रमिक जा चुके हैं। इन लोगों को यहां खाने और ठहरने का जिला प्रशासन ने सामाजिक संगठनों के सहयोग से बेहतर प्रबंध किया है, लेकिन सिर्फ अपने घर जाने की जिद्द के कारण ये यहां नहीं रूकना चाहते।
जिला प्रशासन द्वारा खोले गए शैल्टर होम में रह रहे करीबन 700 लोगों को भिवानी से ट्रेन के जरिए मध्य प्रदेश भेज दिया गया है। अब 2 हजार के करीबन प्रवासी और बचे हुए जिन्होंने रजिस्ट्रेशन करवाया हुआ है। इनमें से अधिकतर तो काफी समय से यहीं पर रहकर अन्य कार्य करते रहे हैं। इन्होंने किराए पर मकान तक लिए हुए हैं। बस या ट्रेन का प्रबंध होते ही इन लोगों के पास मैसेज भेज दिया जाता है और ये लोग अपने प्रदेश के लिए भेज दिए जाते हैं।
85 % रेहड़ी लगाने वाले यूपी और एमपी के
शहर में सब्जी व अन्य कई तरह की रेहड़ियां लगाकर सामान बेचने वाले प्रवासी शहर में लंबे समय से परिवार के साथ रह रहे हैं। बल्कि सालभर में ये कभी भी घर जाते हैं तो आते वक्त अपने कई अन्य साथियों को भी यहां रोजगार के लिए लेकर लौटते हैं। बाजार में अब कुछ अधिक काम है नहीं। घर जाने की फ्री में सुविधा मिल रही है। इस कारण से घर वालों से मिलने के लिए दो चार महीनों के लिए निकल रहे हैं। इनका कहना है कि सबकुछ ठीक हो जाएगा तब फिर से वापस लौटकर आएंगे।
भिवानी रेलवे स्टेशन से 679 श्रमिक रवाना
जिले में पहले से ही सरकार की शर्तों के कारण काफी कम क्रेशर चल रहे थे। अब लॉक डाउन के दौरान इनको बंद कर दिया गया था। इन पर जो लेबर कार्य करती थी वह भी अपने प्रदेश के लिए रवाना हो लिए। अब मुश्किल से 50 क्रेशर भी नहीं चल पा रहे हैं। पहले करीबन 225 क्रेशर चलते थे। सोमवार रात को भिवानी रेलवे स्टेशन से मध्य प्रदेश के लिए 679 श्रमिकों को ट्रेन से विधायत सोमबीर सांगवान व उपायुक्त श्यामलाल पूनिया ने रवाना किया।
‘लेबर की कोई समस्या नहीं’
प्लास्टिक पाइप फैक्ट्री संचालक अशोक स्वामी का कहना है जिले में बड़ी फैक्ट्रियां नहीं हैं। कूलर, पाइप, प्लास्टिक का दाना, तेल मील और आटा मिल जैसे संस्थान चलते हैं। इनमें अधिक लेबर की आवश्यकता नहीं होती। संख्या के अनुसार लोकल में काम करने मिल जाते हैं। इसलिए उनके सामने लेबर की कोई समस्या नहीं है।
अधिकतर गांवों में धान की बिजाई पर रोक
जिले में लोहारू कैनाल के साथ लगने करीबन दो दर्जन गांवों में काफी समय पहले धान की बिजाई शुरू की थी। लेकिन बरसात के दिनों में गांव में पानी पहुंचने के लगभग गांवों की पंचायतों ने धान की बिजाई पर प्रबंध लगाया हुआ है। ऐसे में प्रवासी श्रमिकों की जरूरत रबी की फसल की कटाई और कढ़ाई में ही जरूरत पड़ती है।
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