बुधवार, 24 मार्च 2021

शहीदों को किया याद:आरएसएस से जुड़े लोग गवाही नहीं देते तो भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी नहीं होती: भूता


  • शहर में शहीद भगत सिंह और सुखदेव को पुष्प अर्पित कर किया नमन,कांग्रेस, 

  • अभाविप और अन्य संगठन से जुड़े लोगों ने आयोजित की संगोष्ठी

1931 आते आते शहीद भगत सिंह असली मायनों में राष्ट्रीय प्रतीक बन चुके थे। भगत सिंह एक ऐसा व्यक्तित्व हैं जिसे महज 23 साल की उम्र में उस साल 23 मार्च को फांसी पर लटका दिया गया था। भगत सिंह और दूसरे क्रांतिकारियों ने जब एएसपी जॉन सॉडर्स की हत्या की तो रातों रात वे पूरे देश के लिए हीरो बन गए। उस जमाने में देश की किसी भी भाषा का कोई भी अखबार ऐसा नहीं था जिसने इनके मुकदमे की रिपोर्ट न छापी हो। 1929 से 1931 के बीच तमाम सुर्खियों का केंद्र शहीद भगत सिंह ही रहे। महात्मा गांधी से लेकर जवाहर लाल नेहरू तक हर राष्ट्रीय नेता ने भगत सिंह के मुकदमे के बारे में बयान जारी किए और मुकदमे की सुनवाई के दौरान टिप्पणियां की। लेकिन उस दौर का एक भी आरएसएस नेता सामने नहीं आया जिसने भगत सिंह की फांसी के खिलाफ एक भी शब्द बोला हो। गोलवलकर और सावरकर दोनों की इस मामले में चुप्पी शक पैदा करती है। ये दोनों भी स्वंयभू क्रांतिकारी थे, लेकिन इन्होंने भगत सिंह की फांसी का विरोध नहीं किया। यहां तक कि शोधकर्ताओँ को पेरियार का भी एक बयान मिलता है जिसमें उन्होंने भगत सिंह को फांसी दिए जाने की निंदा की थी, लेकिन संघ से जुड़े किसी व्यक्ति का कोई भी बयान या टिप्पणी तलाशने पर भी नहीं मिलती। ये विडंबना नहीं तो क्या है कि इन्हीं भगत सिंह को आरएसएस आज अपना आदर्श बनाने और उनकी विरासत को अपनाने बनाने की कोशिश कर रही है। भगत सिंह दो साल तक जेल में रहे और इस दौरान उन्होंने समाचारपत्रों और अपने साथियों को लंबे लंबे बेशुमार पत्र लिखे। जब भगत सिंह और उनके साथियों ने असेंबली में बम फेंके थे तो टाइम्स ऑफ इंडिया की हेडलाइन थी, “रेड्स स्टॉर्म दि असेंबली”। और ये भी तथ्य है कि भगत सिंह द्वारा दिया गया नारा, “इंकिलाब जिंदाबाद” बेहद लोकप्रिय हुआ था। इसलिए इस बात में कोई शक नहीं रह जाता कि भगत सिंह अपने विचारों से एक कम्यूनिस्ट थे और उनके लेखन में समाजवादी विचार ही झलकते थे। मॉडर्न रिव्यू, ट्रिब्यून, आनंदबाजार पत्रिका, हिंदुस्तान टाइम्स और उस दौर के सभी दूसरे प्रमुख अखबारों में भगत सिंह के लेख प्रमुखता से प्रकाशित भी होते थे। यहां तक कि असेंबली में उन्होंने जो पर्चे फेंके थे, वे भी लाल रंग के ही थे। ये भी ध्यान देने की बात है कि देस के अलग-अलग कोनों से प्रकाशित होने वाले सभी अखबार भगत सिंह के संदेशों को मान्यता देने और उन्हें प्रमुखता से छापने में एक थे। इनमें इलाहाबाद से प्रकाशित दि लीडर, कानपुर का प्रताप, बॉम्बे (अब मुंबई) से प्रकाशित फ्री प्रेस जर्नल, मद्रास (अब चेन्नई) से प्रकाशित दि हिंदू के अलावा लाहौर, दिल्ली और कलकत्ता (अब कोलकाता) से प्रकाशित होने वाले अखबार भी शामिल हैं। अखबारों में उन्हें लेकर इतना अधिक छपता था कि भगत सिंह उस दौर के सबसे लोकप्रिय नेता बन गए थे।

भगत सिंह के राष्ट्र और राष्ट्रवाद के विचार को नए सिरे से स्थापित करने की तुरंत जरूरत है। उन्होंने सांप्रदायिक दंगों के खिलाफ लिखा। उन्होंने दलितों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ लिखा। उनका राष्ट्रवाद संकीर्णता वाला नहीं बल्कि अच्छी तरह सोचे-समझे विचारों और तर्कों पर आधारित था। उनका राष्ट्रवाद संघ परिवार के संकीर्ण और सीमित तर्कों का असली जवाब है।

हिचकिचाते हुए ही सही, लेकिन महात्मा गांधी ने भी स्वीकारा था कि भगत सिंह बेहद साहसी व्यक्ति थे। जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि भगत सिंह के विचार अत्यंत प्रगतिशील थे। लेकिन इन साहसी और प्रगतिशील विचारों को सतर्कता के साथ मानने के बावजूद कांग्रेस नेताओं ने कभी भी भगत सिंह को वह महत्व नहीं दिया जिसके कि वे हकदार थे। आजादी के बाद भी भगत सिंह के लेखों को अनदेखा किया जाता रहा। यहां ये ध्यान दिलाना जरूरी है कि भगत सिंह की रचना, मैं एक नास्तिक क्यों हूं, को हिंदी से बहुत पहले, सबसे पहले 1934 में पेरियार ने तमिल में अनुदित किया। 70 के दशक के नक्सलवाड़ी आंदोलन के दौरान वामपंथियों ने भगत सिंह की विरासत पर अपना अधिकार जताया लेकिन न तो मीडिया और न ही शिक्षा जगत ने इस पर कोई विशेष ध्यान दिया। यही वह समय था जब इतिहासकार बिपन चंद्रा ने एक नई रूपरेखा के साथ भगक सिंह की रचना, मैं नास्तिक क्यों हूं को पुस्तक के रूप में दोबारा प्रकाशित किया। इस पुस्तक के बाद से भगत सिंह में नए सिरे से रूचि पैदा हुई। भगत सिंह की भतीजी वीरेंद्र संधू ने भी भगत सिंह पर एक पुस्तक लिखी और मेरी पुस्तक, भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज, भी 1986 में राजकमल प्रकाशन ने छापी। हालांकि इस पुस्तक के कई संस्करण आ चुके हैं लेकिन बिपन चंद्रा की पुस्तक के अलावा अंग्रेजी में भगत सिंह पर बहुत ज्यादा कुछ उपलब्ध नहीं है। यही वह समय भी था जब बीजेपी और आरएसएस ने भगत सिंह पर अपना दावा करना शुरु किया। अलग खालिस्तान की मांग के आंदोलन के दौरान इन्हीं तत्वों ने दावा किया कि भारत माता की जय का नारा दरअसल भगत सिंह ने दिया था। हो सकता है कि भगत सिंह ने ये नारा भी लगाया हो, लेकिन यह अकाट्य सत्य है कि फांसी पर झूलने से पहले भगत सिंह ने जो आखिरी नारा लगाया था और जो लोगों की जुबान पर था, वह है इंकिलाब जिंदाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद । आरएसएस के मुखपत्र पॉच्जन्य ने 2007 में भगत सिंह पर एक विशेषांक निकाला था। करीब 100 पन्नों के इस विशेषांक में ये साबित करने की कोशिश की गयी कि भगत सिंह कम्यूनिस्ट नहीं थे और उन्होंने, मैं नास्तिक क्यों हूं, नाम की रचना नहीं लिखी थी। वामदल काफी देर से भगक सिंह के क्रांतिकारी किरदार को समझ पाए। वामदलों की सरकारों ने अनमने तरीके से भगत सिंह के पत्रों को प्रकाशित किया और आखिरकार दस्तावेज भी मराठी में अनुदित हुई। नतीजा ये निकला कि आरएसएस और बीजेपी को यह मानने पर मजबूर होना पड़ा कि भगत सिंह दरअसल एक कम्यूनिस्ट और नास्तिक थे। लेकिन अब संघ और बीजेपी उन्हें नए सिरे से अपने तरीके का राष्ट्रवादी साबित करने पर तुले हुए हैं, लेकिन यह तथ्य है कि भगत सिंह के राष्ट्रवाद और संघ के संकीर्ण राष्ट्रवाद में जमीन-आसमान का फर्क है। दरअसल भगत सिंह उस आजादी के पक्ष में नहीं थे जिसमें गोरे साहबों की जगह भारतीय साहब, जिन्हें उस दौर में ब्राउन साहब कहा जाता था। उन्होंने एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना की थी जिसमें कामगारों, किसानों और आम लोगों को आजादी मिले और वे सशक्त और सक्षम हों। उन्होंने वैश्विक और अंतर्राष्ट्रीय भाईचारे और महासंघ की बात की थी। लेकिन बीजेपी का दोगलापन जगजाहिर है। मिसाल के तौर पर, यह तय हो चुका था कि चंडीगढ़ अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम शहीद भगत सिंह के नाम पर होगा। लेकिन जब से हरियाणा में बीजेपी सरकार आयी है, लगातार ये कोशिशें हो रही हैं कि हवाई अड्डे का नाम आरएसएस नेता मंगल सैन के नाम पर कर दिया जाए।

(डॉ चमनलाल जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त प्रोफेसर और एक प्रमुख शिक्षाविद्, लेखक और अनुवादक हैं। भगत सिंह पर उनका लेखन प्रसिद्ध है। यहां पेश विचार उन्होंने विश्वदीपक शर्मा से बातचीत में व्यक्त किए)

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