जमीन की सटीक जानकारी के लिए कुछ दिन बाद परेशान नहीं होना होगा। जमीनों के सही सीमांकन के लिए पूरे प्रदेश में कंटीन्यू ऑपरेटिंग रेफरेंस स्टेशन (कॉर्स) बनाए जा रहे हैं। इसमें मोबाइल टावर की तरह टावर लगाए जाएंगे और एक यंत्र के माध्यम से जमीन की मैपिंग की जाएगी। इससे गलती की गुंजाइश खत्म होने के साथ समय की बहुत बचत होगी।
राजस्व विभाग ने सर्वे ऑफ इंडिया के साथ इस प्रोजेक्ट के लिए एक एमओयू किया है। सर्वे ऑफ इंडिया मप्र के साथ अन्य कई राज्यों में यह काम कर रहा है। इसके लिए प्रदेश में 25 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे।
लोकेशन सबसे महत्वपूर्ण
किसी जमीन की व्याख्या 4 बिंदुओं पर होती है। मालिकाना हक यानी किसके नाम है। एरिया यानी क्षेत्रफल कितना है। आकार यानी शेप कैसा है और लोकेशन यानी वह कहां स्थित है। इसमें लोकेशन सबसे महत्वपूर्ण होती है।
बदलाव की एक वजह यह भी... कहीं गायब हो गए चांदा पत्थर तो कहीं बदली लोकेशन
समस्या खत्म होगी-जमीन की नपती के लिए चांदा पत्थर माइल स्टोन होता है, जिससे ही जमीन की वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाता है। कई स्थानों पर चांदा पत्थर गायब हो गए हैं, तो कई जगह उन्हें उखाड़कर जगह बदल दी।
रोवर से होगा काम-अभी नपती के लिए पटवारी को रेंजिंग रॉड, रिफ्लेक्टर, ईटीएस मशीन लेकर घूमना पड़ता है। कॉर्स लगने से केवल रोवर लेकर जाना होगा। यह मोबाइल के आकार का एक उपकरण है, जिसे आसानी से रखा जा सकेगा।
भोपाल में बनेगा सेंट्रल सर्वर : इसके लिए भोपाल में सेंट्रल सर्वर बनेगा, जो इंटरनेट के माध्यम से टावरों से कनेक्टेड रहेगा। ये टावर अपनी रीडिंग सर्वर को भेजेंगे। जब रोवर किसी टावर के संपर्क में आएगा, तो उसे एकदम सटीक जानकारी मिल जाएगी। सर्वे ऑफ इंडिया जियोमेट्रिक नेटवर्क भी बना रहा है। इसके हिसाब से ही टावरों की संख्या तय होगी।
अन्य विभागों को भी फायदा होगा
कॉर्स लगने से नक्शे बनाना आसान होगा। इसका फायदा माइनिंग, सड़क नेवीगेशन सहित अन्य योजनाओं में भी मिलेगा। हर जिले में औसतन दो टावर लगेंगे। हर जगह और मौसम में काम हो सकेगा। सीमांकन में समय कम लगेगा और पेंडिंग मामले भी जल्दी निपटेंगे।
- बी ज्ञानेश्वर पाटिल, सचिव, राजस्व
0 coment rios:
Hi friends