सोमवार, 19 अक्टूबर 2020

युवा मरीजों की मौत की मुख्य वजह स्टॉर्म, सारे अंग काम करना बंद कर देते हैं; कुल 659 मौतों में 263 की जान इससे गई

युवा मरीजों की मौत की मुख्य वजह स्टॉर्म, सारे अंग काम करना बंद कर देते हैं; कुल 659 मौतों में 263 की जान इससे गई

(नीता सिसौदिया) 36 साल की महिला के फेफड़े कोविड संक्रमण से 80 प्रतिशत खराब हो गए। महिला छह दिन से होम आइसोलेशन में थी। डी-डायमर जांच से पता चला मरीज में ‘साइटोकॉइन स्टॉर्म’ आ चुका है। महिला को बचा न सके। इसी तरह 72 वर्षीय एक महिला के फेफड़े 50 प्रतिशत खराब हो गए। टॉसिलिजुमैब इंजेक्शन लगाया गया, प्लाज्मा थैरेपी दी, रेमेडेसिविर इंजेक्शन भी लगाए, लेकिन दो हफ्ते भर्ती रहने के बाद भी मौत हो गई।

शहर में कोरोना से अब तक मारे गए 659 लोगों में करीब 40 फीसदी यानी 263 लोगों की जान इसी स्टॉर्म ने ली है। बाकी मरीजों की मौत एआरडीएस (एक्यूट ऑक्सीजन रेस्पिरेटरी सिंड्रोम) से हुई। डॉक्टरर्स के अनुसार, युवाओं की कोरोना से मृत्यु के लिए सबसे ज्यादा यही स्टाॅर्म जिम्मेदार है। प्रो. डॉ. मनोज केला कहते हैं कि स्टॉर्म के प्रभाव से स्वस्थ दिखने वाला मरीज अचानक गंभीर हो जाता है। टिशू तक ऑक्सीजन नहीं पहुंचने के कारण मल्टी ऑर्गन फेल्यूअर हो जाता है।

इम्युन सिस्टम वायरस की बजाय शरीर को नुकसान पहुंचाने लगता है
चेस्ट फिजिशियन डॉ. रवि डोसी कहते हैं कि शरीर में साइटोकॉइन बनना सामान्य प्रक्रिया है। कोरोना में यह अनियंत्रित गति से बनने लगते हैं। इसका तूफान सा आता है। इसीलिए इसे ‘साइटोकॉइन-स्टॉर्म’ कहते हैं। यानी कोविड-19 से लड़ने वाला हमारा इम्यून सिस्टम ओवर-रिएक्ट करता है। रोग प्रतिरोधक कोशिकाएं ही हमारे शरीर के विपरीत काम करने लगती हैं। जिन लोगों में इम्यूनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) कम हो, उम्रदराज, पुरानी लंबी बीमारी से जूझ रहे और शारीरिक रूप से कम एक्टिव लोगों में इसका खतरा ज्यादा है। शहर में कोरोना से 40 फीसदी मौतें इसकी वजह से ही हुई हैं।

हर सौ में से चार मरीजों में ‘साइटोकॉइन-स्टॉर्म’, डायबिटीज नहीं हो पाती कंट्रोल
एमजीएम मेडिकल कॉलेज के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग प्रमुख डॉ. सलिल भार्गव कहते हैं ज्यादातर लोगों की मौत एक्यूट ऑक्सीजन रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (एआरडीएस) से हुई है। डायबिटीज कंट्रोल करने में परेशानी हुई। साइटोकॉइन स्टॉर्म बीमारी के पांचवें या सातवें दिन आने वाला तूफान है। इसमें वायरस नाक और मुंह से होते हुए फेफड़ों पर अटैक करता है, जिस कारण वहां की एलोलाई कड़क हो रही है। यह जालीनुमा रचना होती है, जो ऑक्सीजन सोखती है और छोड़ती है, लेकिन पूरी तरह ब्लॉक होने से शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह खत्म हो जाता है। ऑर्गन फेल हो जाते हैं।

दुनिया को वुहान से मिली साइटोकॉइन-स्टॉर्म की जानकारी
साइटोकॉइन-स्टॉर्म की जानकारी दुनिया को वुहान से मिली। वहां रिसर्च में आईएल-2 व आईएल-6 का पता लगा जो स्टॉर्म के लक्षण थे। 150 केस पर हुई अन्य रिसर्च में पता लगा कि मरने वालों में आईएल-6 सीआरपी स्टॉर्म के मॉलिक्यूलर इंडिकेटर ज्यादा थे।

दो तरह से वार कर रहा कोरोना वायरस

  • पहला वायरस फेफड़े खराब कर देता है। दूसरी श्रेणी ऐसे मरीजों की है, जिनके फेफड़ों पर वायरस का प्रहार नहीं हुआ, लेकिन सोडियम का स्तर बढ़ गया।
  • मरीजों काे रिकवर होने में कई हफ्ते लग रहे हैं। रिकवरी टाइम अब बढ़कर 5 हफ्ते तक हो गया है।
  • निमाेनिया के बाद मरीज की एआरडीएस से मौत हो रही है। इसमें फेफड़ों में एक तरल पदार्थ जमा हो जाता है। इससे एयर पाइप में रुकावट आती है और मरीज सांस नहीं ले पाता।
  • बचाव के लिए जिंक, विटामिन-सी और मल्टी विटामिन की गोली लेने के बजाय प्राकृतिक रूप से खाने में इसकी मात्रा बढ़ाए। नियमित एक्सरसाइज करें।


स्टॉर्म के कारण कोरोना से ठीक होने के बाद भी मरीजों को ऑक्सीजन देने की जरूरत पड़ रही है।




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