- बेटे ने एक हाथ से बॉटल और दूसरे हाथ से सहारा देकर बुजुर्ग माँ को दूसरे प्लेटफॉर्म पहुँचाया
कहने को तो पश्चिम मध्य रेलवे के मुख्यालय जबलपुर के मुख्य रेलवे स्टेशन को ए-वन का दर्जा प्राप्त है, लेकिन यात्री सुविधाओं के मामले में इसकी हैसियत कस्बाई रेलवे स्टेशन से ज्यादा नहीं है। खासतौर पर बीमार और बुजुर्ग यात्रियों को बेहतर सेवाएँ देने का रेल प्रशासन द्वारा दावा किया जाता है, लेकिन इसकी हकीकत वक्त-वक्त पर खुलकर सामने आ जाती है।
ऐसा ही एक दर्दनाक, लेकिन रेलवे की खोखली व्यवस्थाओं को आईना दिखाने वाला नजारा प्लेटफाॅर्म नं. 6 के मेन गेट पर दिखाई दिया, जब करीब 70 वर्ष से अधिक उम्र की एक बीमार महिला यात्री ऑपरेशन कराने के बाद स्टेशन पहुँची, उसके पेट में नली लगी हुई थी और महिला का पुत्र माँ के पेट से निकली नली, जिसमें खून दिखाई दे रहा था, से जुड़ी बोतल को हाथ में लेकर साथ-साथ चल रहा था।
मेन गेट से भीतर आते ही बेटे ने रेलवे स्टाफ से प्लेटफार्म नं. 4 पर जाने के बारे में पूछा और स्टेशन पर मरीजों के लिए मिलने वाली व्हील चेयर की उपलब्धता के बारे में जानकारी माँगी, वहाँ मौजूद रेलकर्मियों ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया। उसके बाद माँ की बिगड़ती तबियत से व्याकुल पुत्र ने बैटरी ऑपरेटेड कार के बार में पूछा तो रेल स्टाफ ने कहा कि वो बंद हो चुकी है।
ऐसे में हैरान-परेशान बेटे ने एक हाथ में बोतल और दूसरे हाथ से माँ का कंधा थामा और धीरे-धीरे दूसरे प्लेटफाॅर्म की ओर थके कदमों से चल पड़ा। स्टेशन पर मौजूद रेल स्टाफ मूकदर्शक बनकर सब कुछ देखता रहा। बीमार महिला यात्री और उसके असहाय पुत्र की पीड़ा से रू-ब-रू होने वाले जिन यात्रियों ने यह नजारा देखा, कुछ देर के लिए उनके दिल पसीज गए। उन्होंने कहा कि रेलवे यात्रियों से मनचाहा किराया वसूल करता है, लेकिन सुविधाएँ देने में आनाकानी की जाती है।
कोरोना काल के बाद से हालात होते जा रहे बदतर
यात्रियों का आरोप है िक कोरोना काल के बाद से जबलपुर रेलवे स्टेशन पर मिलने वाली यात्री सुविधाओं की हालत बद से बदतर होती जा रही है। इसका सबसे ज्यादा नुकसान बीमार और बुजुर्ग यात्रियों को हो रहा है, जिनकी तकलीफों को सुनने-जानने को कोई तैयार नहीं है।
कहने को तो स्टेशन पर बीमार, बुजुर्ग और दिव्यांगों के लिए रैम्प बना दिए गए हैं, लेकिन इनका फायदा तब शरीर से कमजाेर हो चुके यात्रियों को मिलेगा जब स्टेशन के भीतर उन्हें ट्रेन तक पहुँचने के लिए व्हील चेयर और बैटरी ऑपरेटेड कार की सुविधाएँ मिलें। बताया जाता है कि पहुँच वाले यात्रियों को यह सुविधाएँ जैसे-तैसे मिल ही जाती हैं, लेकिन आम यात्री तरसते रहते हैं, उन्हें कोई सुविधाएँ नहीं मिल पातीं।
पहले 6 बैटरी ऑपरेटेड कारें थीं, अब सिर्फ एक चल रही
रेलवे से मिली जानकारी के अनुसार कोरोना काल के पहले मुख्य रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की सुविधा के लिए 6 बैटरी ऑपरेटेड कारें चलती थीं, जो नि:शुल्क थीं। कोरोना के कहर के बाद 5 वाहनों का क्या हुआ किसी को पता नहीं, लेकिन अब केवल एक सामाजिक संगठन की बैटरी ऑपरेटेड कार चल रही है।

0 coment rios:
Hi friends