शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

शहर के फेफड़ों की तरह, बदलाव से बिगड़ेगा ईको सिस्टम; 14 साल में दूसरी बार रालामंडल को डी-नोटिफाई की कोशिश

शहर के फेफड़ों की तरह, बदलाव से बिगड़ेगा ईको सिस्टम; 14 साल में दूसरी बार रालामंडल को डी-नोटिफाई की कोशिश

(राहुुल दुबे) लाखों पेड़-पौधों के जरिए शहर तक शुद्ध हवा पहुंचाने वाले रालामंडल को 14 साल में दूसरी बार सरकार ने कैफेटेरिया, मनोरंजन केंद्र का लेवल लगाकर डी-नोटिफाई करने की कोशिश की। चिड़ियाघर को शिफ्ट करने का प्रस्ताव भले ही अधर में हो, पर ये स्पष्ट है कि मास्टर प्लान 2021 के प्रावधानों के तहत इसे संरक्षित रखने के लिए आसपास कोई इंडस्ट्री या ऐसी गतिविधि को अनुमति नहीं दी जा सकती, जिससे यहां के ईको सिस्टम को नुकसान पहुंचे।

चिड़ियाघर का प्रस्ताव लाने से पहले वन मंत्री विजय शाह पहले भी यहां के लिए एम्युजमेंट पार्क शुरू करने का सुझाव दे चुके हैं। यह तब का मामला है, जब पहली बार उन्होंने ये विभाग संभाला था। तब मुख्य वन संरक्षक एसएस निनामा ने एम्युजमेंट पार्क जैसी गतिविधि शुरू करने की तैयारी भी कर ली थी। अब जब शाह के पास फिर ये महकमा है तो चिड़ियाघर की शिफ्टिंग के लिए बैठकें शुरू हो गईं। हालांकि वन विभाग के अफसर इसमें बैकफुट पर नजर आ रहे हैं।

मात्र 50 मीटर का सुरक्षा दायरा है यहां
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अभयारण्य का सुरक्षा घेरा बनाने के लिए ईको सेंसिटिविटी कमेटी बनी थी। कमेटी ने 50 मीटर का दायरा बनाया, जिसमें सभी गतिविधियां प्रतिबंधित कर दी गईं, लेकिन इस फैसले से पहले ही रालामंडल के चारों तरफ फार्म हाउस, टाउनशिप, कॉलेज, ढाबे खुल गए और अतिक्रमण भी हो गया।

पहले एक करोड़ 17 लाख में हुआ था सौदा
2006-07 में रालामंडल को पीपीपी मोड पर देने का प्रस्ताव तत्कालीन वन संरक्षक ओपी चौधरी ने तैयार किया। एक करोड़ 17 लाख रुपए की लागत से यहां ओपन एयर रेस्त्रां, काॅटेज सहित कई निर्माण की योजना बनी थी। डी-नोटिफाई की प्रक्रिया करते, उसके पहले लोेगों का विरोध हो गया और इसे निरस्त करना पड़ा।

समिति की मंजूरी बिना काम नहीं हो सकता
रिटायर्ड संयुक्त वन संरक्षक व रालामंडल के अधीक्षक रहे अशोक खराटे के मुताबिक, अभयारण्य में एक भी काम सुप्रीम कोर्ट की साधिकार समिति की अनुमति के बगैर नहीं किया जा सकता। कैफेटेरिया, रेस्त्रां जैसी गतिविधि अभयारण्य के अंदर नहीं की जा सकती। रालामंडल जैसी स्थिति में है, उसे वैसा ही रखा जाना उचित होगा।

चीतल, हिरण चिंकारा भी हैं यहां
यहां 90 चीतल, 45 काले हिरण, 60 नीलगाय, 15 सांभर, 6 चिंकारा, 6 भेड़की हैं। पांच सौ से ज्यादा मोर 247 हेक्टेयर में फैले हैं। हर साल चीतल की संख्या 20 से 25 बढ़ रही है। यहां सांपों की दर्जनों प्रजातियां हैं, उन पर स्टडी भी हो चुकी है। 30 से ज्यादा तरह की चिड़िया हैं, जिन्हें देखने पर्यटक आते हैं।

रालामंडल में आने वालों को अच्छी सुविधा मिल सके, इसके प्रयास किए जाएंगे। बच्चों के लिए गार्डन, झूले, पार्किंग, अभयारण्य के बाहर हल्का-फुल्का चाय, नाश्ता मिल जाए यह सब संसाधान यहां जुटाएंगे। इसे डी-नोटिफाई करने की योजना नहीं है।
- अशोक वर्णवाल, प्रमुख सचिव वन विभाग

चिड़ियाघर भी रहना चाहिए और रालामंडल भी विकसित होना चाहिए। ज्यादातर जानवर चिड़ियाघर में ही रखे जाएं, जबकि अधिक संख्या वाले टाइगर, लॉयन और तेंदुए जैसे प्राणियों में से आधे को रालामंडल भेज देना चाहिए। इससे सभी प्राणियों को रहने के लिए पर्याप्त जगह मिल जाएगी।
- शंकर लालवानी, सांसद

रालामंडल का संपूर्ण विकास जरूरी है, मगर चिड़ियाघर में भी कई विकास कार्य चल रहे हैं। उसे खत्म करने या रोकने के बजाय जंगल जैसे पिंजरे बनाकर जानवरों की संख्या सीमित की जा सकती है। मंत्री को इंदौर की भावनाओं से अवगत करवाएंगे। शहर की जनता की राय भी इस बारे में ली जाएगी।
- तुलसी सिलावट, पूर्व मंत्री

रालामंडल का ड्रोन व्यू


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