‘मैं थकने लगता हूं सूरज के साथ चल-चल कर, अजीब सुस्त क़दम हमसफ़र मिला है मुझे/ एक आग है जो घेरे है हर तरफ से मुझे, और उस पर जब्र कि काग़ज़ का घर मिला है मुझे...’ मरहूम शायर राहत इंदौरी की याद में कराए गए फेस्ट ‘राहत के पल’ का आग़ाज़ उन्हीं के अश्आर से किया गया। आर्ट ऑन क्लिक की ओर से 12 घंटे तक कराए गए इस कला समारोह में गायक, नर्तक, चित्रकार और किस्सागो भी शामिल हुए और इन सभी कलाकारों ने शहर के उस कलाकार को श्रद्धांजलि दी जिसने इंदौर का नाम दुनियाभर में मशहूर किया।
समारोह की शुरुआत विचारगोष्ठी से हुई जिसका संचालन शिवा कुंदेर ने किया। इसमें राहत इंदौरी की शायरी, शेर पढ़ने के उनके अंदाज़ और पोएट्री की तकनीक पर बात की गई। राहत इंदौरी के करीबी जानते हैं कि वे पहले तरन्नुम में यानी गाकर शेर पढ़ते थे। 40 बरस पहले जयपुर में हुए एक मुशायरे में उन्होंने जब नूर इंदौरी को सुना तो उन्हें लगा- मैं अच्छा नहीं गाता, तरन्नुम में पढ़ना छोड़ देना चाहिए और फिर तहत में तेवर के साथ पढ़ने का वो सिलसिला शुरू हुआ जिसने राहत को पूरी दुनिया का महबूब शायर बना दिया।
कलम की नोंक पर राहत
कार्यक्रम में आद्रिका नायर, हर्षिता पाटिल, इशानी कृष्णन, पूर्वा पांडेय, सुदेशना दानी और कनिथा शिवकुमार ने भरतनाट्यम व शताक्षी जोशी, तृषा राजहंस, लक्षिता हांडा, श्रेया मालवीय, शुवांशी नागवानी, काव्या वर्मा ने कथक प्रस्तुति दी| वेदिका मस्की ने कैनवस पर राहत को उकेरा। लक्षयति काजलकर ने गायन, प्रद्युम्न चंद्र ने वायलिन वादन, मुद्रा दवार ने कथक और रूपेश ने उदयप्रकाश की टेपचू कहानी प्रस्तुति की। रक्षा सोनी ने पेंसिल की नांक पर बड़ी बारीकी से राहत इंदौरी का नाम उकेरा। शिवानी गुप्ता ने कप सॉन्ग और किशन कथक ने सितारवादन किया।
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