मंगलवार, 10 मार्च 2020

प्राकृतिक रंगों से जशपुर में खेली जाती है होली, धवई के फूलों से बनाए हैं रंग


{फूलों को पानी में उबालकर बना लेते
हैं कलर
{इस रंग से त्वचा को कोई नुकसान नहीं


आदिवासी बाहुल्य जशपुर में आज भी प्राकृतिक रंग गांव-गांव में बनाए जाते हैं। इस वर्ष भी धवई के फूलों से रंग कई गांव में तैयार किए जा रहे हैं। रंग बनाने के लिए दो दिन पहले ही फूलों को पानी में उबालकर छोड़ दिया गया है।

जिले के जशपुर, मनोरा, सन्ना, बगीचा, आस्ता के जंगलों में धवई फूलों की बहुलता है। वहीं नीचे घाट कहे जाने इलाके कुनकुरी, दुलदुला, पत्थलगांव, फरसाबहार के जंगलों में पलाश के पेड़ काफी संख्या में पाए जाते हैं। धवई फूल का समर्थन मूल्य 32 रुपए प्रति किलो तय किया गया है। जंगल में एक झाड़ीनुमा पौधों की शाखाओं पर लाल-लाल सुंदर फूल लड़ियों में लगा करते थे। गांव की औरतें इनके फूलों को इकट्ठे कर तथा सुखाकर गल्ला व्यापारियों को भी बेचा जाता है। हजारों सालों से हम फूलों कि सुंदरता को देखते और महक का आनंद लेते आए हैं। उनके इन्हीं रंगों में उनकी बहुत सारी खूबियां छिपी हुई हैं। अभी तक अधिकांश लोग यही जानते थे।

बेहतर रंग: प्रोफेसर अमरेंद्र

एनईएस कॉलेज के अर्थशास्त्र प्राध्यापक डॉ.अमरेंद्र सिंह कहते कि ग्रामीणों के लिए फूल काव्य का नहीं अर्थशास्त्र है। फूलों का समर्थन मूल्य तय होने से वनवासी संग्राहकों को भी इस योजना का पूरा लाभ मिलेगा जिससे उनकी आर्थिक उन्नति तो होगी ही साथ ही रोजगार के द्वार भी खुल सकेंगे। होली रंगों का त्योहार है। रंगों के इस त्योहार में सिंदूरी लाल धवई और पलाश के फूल का जिक्र न हो, ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि लंबे समय से इसके फूलों का प्रयोग रंग बनाने के लिए किया जाता है। इन रंगों का प्रयोग होली खेलने के लिए किया जाता है।

धवई फूल का पेड़।

यह भी जानें: हर साल 50 लाख के फूल लखनऊ भेजे जाते हैं

व्यवसायी गोपाल सोनी बताते है कि समर्थन मूल्य घोषित होने से पहले से सन्ना, बगीचा, पण्डरापाट, सोनक्यारी, मनोरा, बगीचा में बाहर के व्यापारी धवई फूल की खरीददारी करने पहुंचते है। लगभग 50 लाख का फूल प्रतिवर्ष लखनऊ के लिए जाता है। पंडरापाठ के मिथलेश कहते है कि स्थानीय लोगो को त्योहारों के मौसम में अच्छी आय हो जाती है। ग्रामीण बीरसाय राम , जगमोहन राम , धनमनी बाई , प्रमिला तिर्की बताते है कि उनके पूर्वज इस फूल को स्थानीय बाज़ार में बेचते रहे है। पहले इसकी अच्छी कीमत नहीं मिलती थी अब अच्छी मिलती है, जिससे होली का त्यौहार हम अच्छे से मना पाते है।

प्राकृतिक रंग लोगों के स्वास्थ्य के
लिए भी बेहतर: डॉ.प्रशंात


कन्या कॉलेज के वनस्पति शास्त्र के सहायक प्राध्यापक डॉ.प्रशांत सिंह कहते है कि कृत्रिम रासायनिक रंगों की सुलभता ने भले ही लोगों को प्रकृति से दूर कर दिया हो, लेकिन रासायनिक रंगों से होने वाले नुकसान और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के कारण लोग दोबारा प्रकृति की ओर रुख करते हुए लोग धवई और पलाश के फूलों का इस्तेमाल रंगों के लिए करने लगे हैं। इसको धवई या धंवई कहते हैं। इसके पेड़ों में इसी समय फूल लगता है। इसके लाल रंग के छोटे-छोटे फूल देखने में बहुत खूबसूरत तो होते ही हैं साथ ही इनका आयुर्वेदिक महत्व भी कम नहीं है। इसके फूल में अतिसार, प्रदर , पेचिस और बांझपन के साथ-साथ किडनी की लाइलाज बीमारियों को ठीक करने की क्षमता होती है।

Bagicha News - chhattisgarh news holi is played in jashpur with natural colors colors made from flowers of dhavai




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