गुरुवार, 19 मार्च 2020

47 दिन से घर नहीं गई कोरेंटाइन सेंटर्स की टीम, एयरपोर्ट से संदिग्धों को लेकर आती है, फिर 14 दिन की निगरानी के बाद फूल देकर विदा करती है


दिल्ली (कोरेंटाइन सेंटर्स से राजेश खोखर की रिपोर्ट).मानेसर में 300 तो छावला में 1000 बेड की सुविधा है। 47 दिन पहले शुरू हुए सेंटर्स से दो बार में 742 लोग डिस्चार्ज हो चुके हैं। तीसरा ग्रुप निगरानी में है। यहां की टीम एयरपोर्ट पर स्वागत करती है। फिर 14 दिन तक परिवार की तरह देखरेख करती है। सही होने पर गुलाब देकर विदा करती है। युद्ध स्तरपर काम कर रही टीम 47 दिनों से घर से दूर हैं। सभी कोरोना से जंग जीतने में दिन-रात लगे हैं। जानिए...आर्मी व आईटीबीपी जवानों की टीमों के संघर्ष की कहानी...

संदिग्धों के लिए कोरेंटाइन सेंटर की जरूरत थी

27 जनवरी को आईटीबीपी के डीजी व हरियाणा कैडर के आईपीएस अफसर एसएस देसवाल को स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि हम चीन से कोरोना के संदिग्ध भारतियों को लाना चाहते हैं। उन्हें कोरेंटाइन करने के लिए सेंटर की जरूरत है। 300 बेड की सुविधा के लिए मानेसर में आर्मी से बात चल रही है, वह काफी नहीं है। डीजी ने कहा कि हमें 48 घंटे दीजिए। फिर छावला में सेंटर बनाना तय हुआ। यहां जवानों के लिए 6 फ्लोर की बिल्डिंग तैयार थी, पर पानी, टाॅयलेट व बाथरूम जैसी सुविधाएं नहीं हो पाई थीं, लेकिन सभी ने मिलकर 1000 बेड तय नियमों के अनुसार लगा दिए। छावला के अस्पताल से लेकर आईटीबीपी के सेंटर्स आदि मशीनें जुटाकर सेटअप खड़ा किया गया।

50 सदस्यों की टीम बनाई गई

आईटीबीपी के सीएमओ डॉ. एपी जोशी को नोडल अधिकारी बनाकर आईटीबीपी के 14 डाॅक्टरों, एम्स व सफदरजंग व स्वास्थ्य मंत्रालय के विशेषज्ञों समेत 50 सदस्यों की टीमें बनी। 48 घंटे में सिस्टम खड़ा कर मंत्रालय को बता दिया कि हम तैयार हैं। डॉ. एपी जोशी और उनकी टीम का कहना है, ‘देश में कोरोना से लड़ने के लिए बहुत अच्छे प्रबंध हैं। हम इतना ही कहना चाहते हैं कि डरो ना, आप सुरक्षित हाथों में हो। जरूरत होगी, तब तक हम ऐसे ही सेंटर में लोगों की देखरेख करेंगे और सभी हमारी फैमिली की तरह ही हैं। बस लोग जागरूक रहें और थोडा-सा भी संदेह होने पर खुद आगे आएं और जांच कराएं।’

48 घंटे में तैयार हुई थी वर्ल्ड क्लास अस्पताल जैसी सुविधा

नोडल अधिकारी और आईटीबीपी के सीएमओ डॉ. एपी जोशी बताते हैं, ‘कोरेंटाइन सेंटर शुरू करने में सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि कोई गाइडलाइन नहीं थी। इसलिए जीरो से काम शुरू करना पड़ा। मन में ठान लिया कि करना है तो करना है। परिवार का रिएक्शन भी अच्छा नहीं था। सब कह रहे थे, कैसे करोगे। मेरा छोटा बेटा काफी चिंतित था। लेकिन मैंने समझाया कि बॉर्डर पर लड़ाई बताकर नहीं होती। यह भी हमारे लिए जंग है। फर्क इतना है कि इसमें लड़कर अपनों को बचाना है। हमें 1 फरवरी 2020 की रात हमेशा याद रहेगी। चीन से भारतीयों का पहला ग्रुप आना था। पहले कहा गया कि रात 11 बजे आएंगे। फिर 12 से 2 और 4 बजे का समय दिया गया। लेकिन ग्रुप सुबह आया। वह रात बिना सोए काटी और इसी बारे में सोचते रहे। इस ग्रुप में 406 लोग थे। इसमें छात्र ज्यादा थे। पहले तय हुआ था कि सैंपल लेने के लिए अलग से टीम आएगी। बाद में यह तय हुआ कि सैंपल भी हम ही लेंगे। संदिग्ध मरीजों के साथ-साथ खुद को भी वायरस से बचाना था। इसलिए हर काम के लिए नियम तय किए गए और समय के साथ इन्हें बदला भी।

एक सप्ताह की सोच कर आए थे, पर कितने दिन लगेंगे पता नहीं, प्रॉब्लम्स में भी नहीं हिले सदस्य

डॉ. एपी जोशी बताते हैं, ‘पहले सोचा था कि मुश्किल से एक सप्ताह का काम होगा, लेकिन 47 दिन हो गए हैं। तब से परिवार से मिले तक नहीं हैं। इस दौरान कई सदस्यों की फैमिली प्रॉब्लम्स आईं, लेकिन कोई यहां से हिला तक नहीं। अभी कितना और समय लगे, यह भी नहीं पता है। इसलिए टीम को मोटिवेशन की जरूरत पड़ती है। अब काउंसलर व मनोवैज्ञानिक की भी सुविधा की हुई है।

एक बच्चे की जांच करती छावला कोरेंटाइन सेंटर की टीम।




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