राई (देवेंद्र शर्मा ) .हमारे पीएम मोदी ने 22 मार्च को एक दिन का जनता कर्फ्यू लगाने की सलाह दी है। यह हमारे देशी इलाज की एक प्राचीन पद्धति है। हमारे गांव में भी 2007 में अकाल मौत का सिलसिला शुरू हुआ था। 25 दिन में 30 लोगों की मौत हुई थी। फिर प्राचीन संस्कृति के तहत एक दिन गांव के सभी ग्रामीण अपने घरों में कैद रहे। रिश्तेदारों व पड़ोसी गांव वालों को भी नहीं आने दिया गया। इसे एकता का नाम दिया गया था। गाय के दूध की धार व हवन के धुएं से पूरे गांव के घरों व सीमा को देशी तरीके से सेनिटाइज किया गया था। इसका असर हुआ और गांव में मौत का सिलसिला थम गया। यह कहना है दीपालपुर के बुजुर्गाें का। कोरोना को लेकर आंतिल चौबीसी के बुजुर्गाें ने प्राचीन देशी उपचार के बारे में अपने विचार सांझा किए।
कातक की बीमारी इस कोरोना से भी भयंकर
उनके पिताजी बताते थे कि कातक अाली बीमारी आई थी। जिसमें गांव के गांव खाली हो गए थे। एक का शव जलाकर घर अाते तो दूसरे की मौत की खबर मिलती। उस समय एक देशी इलाज लस्सी यानि छाछ ही कारगर साबित हुई थी। लोग कहते थे कि जिसने छाछ पी ली, वह बच गया।-रत्तन सिंह, दीपालपुरवासी।
पशुओं में बीमारी आने पर करते थे किलाबंदी
कोई भी बीमारी पहले पशुओं में आती है। जब फ्लैग फैला तो वह भी जीव जंतुओं आया था। ऐसे में हमें सावधानी बरतनी चाहिए कि ऐसे समय मांसाहार का सेवन न करें। जब पशुओं में मुंह- खुर की बीमारी आती थी तो गांव की किलाबंदी की जाती थी। गांव की सीमाओं की रखवाली होती थी। -साहब सिंह, दीपालपुरवासी।
तेरहवीं से पहले ही हो जाती थी दूसरी मौत
हमारे गांव में 2007 में अकाल मौत होने का सिलसिला शुरू हो गया था। तेरहवीं से पहले ही मौत होना शुरू हो गई। 25 दिन में करीब 30 लोगों की मौत हुई। पूरा गांव परेशान हो गया था। पंचायत हुई और फैसला लिया कि एकता करनी पड़ेगी। देशी बोलचाल में एकता एक तरह का जनता कर्फ्यू होता है। पूरे गांव की सीमाएं बंद की गई। लोगों ने सीमाओं पर पहरा दिया। किसी भी बाहरी व्यक्ति को गांव में प्रवेश नहीं करने दिया। इसके बाद हवन यज्ञ हुआ और हर घर में हवन के धुएं से सेनिटाइज किया गया। इसके गांव में अकाल मौत मरने का सिलसिला बंद हुआ। जयभगवान आंतिल, प्रधान आंतिल बारह खाप।
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