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बुधवार, 10 मार्च 2021

महकते पलाश के साथ गूंजेगी मांदल की थाप:5 पीढ़ियों से परमार कालीन मांदल बनाने की कला को बचाए हुए है​​​​​​​ मांडू का यह परिवार, लकड़ी काटने के लिए पेड़ से लेते हैं इजाजत


  • 21 दिन की मेहनत के बाद निकलती है मांदल और ढोल की सुरीली थाप,

  • पिछले 50 वर्षों से उमराव सिंह बना रहे मांदल और ढोल,


  • कई जिलों के आदिवासी समाज के लोग मांडू से बनवाकर ले जाते हैं

मांडू के घने जंगलों में परमार कालीन समय से ढोल और मांदल बनाने की परंपरा आज भी चली आ रही है। इस हस्तकला को पिछली 5 पीढ़ियों से ज्यादा समय से यहां के उमराव सिंह सहेजे हुए हैं। आज भी उनके पास प्रदेश और दूसरी जगह के आदिवासी समुदाय के लोग मांदल और ढोल बनवाने आते हैं। जितनी सुरीली और खास मांदल और ढोल की थाप है, उतनी ही खास इसे बनाने की प्रक्रिया भी है। फाल्गुन में इसकी गूंज आदिवासी इलाकों में सुनाई देगी।

बसंत की बहार के साथ ही फाल्गुन में मांदल की सुरीली आवाज, पलाश और खाखरे की महक पहाड़ियों के बीच आने लगती है। यह परंपरा बरसों से चली आ रही है। इस काम को मांडू के जंगल क्षेत्र से सटे अवार निवासी उमरावसिंह पिछले 50 वर्षों से कर रहे हैं। वह मालवा, निमाड़ के साथ सतपुड़ा के कई जिलों के लोगों के लिए मांदल तैयार करते हैं।

ऐतिहासिक महत्व
मांडू के सरकारी गाइड व आदिवासी संस्कृति विशेषज्ञ धीरज चौधरी ने बताया, परमार काल में राजाओं द्वारा नए मांदल ढोल बनवाए जाते थे। इन्हें परमार राजाओं द्वारा प्रजा के साथ मिलकर भगोरिया और होली पर विशेष पूजा पाठ कर उत्सव में बजाया जाता था। चौधरी के मुताबिक बसंत के फूलों के आने पर मांडू और आसपास के इलाकों में विशेष पेड़ होता है, जिसे सेमला कहा जाता है। जब यह पेड़ फूल देना शुरू करता है, उसी दौरान इसके तने को काट लेते हैं। फिर शुरू होती है मांदल बनाने की कवायद। इसे बनाने में 21 दिन लगते हैं। इसे काटने से लेकर बनाने तक समय सीमा पर ध्यान देना पड़ता है। नहीं तो यह सुरीली आवाज खो देता है। इस कारण इसे बसंत से लेकर फाल्गुन के बीच में ही बनाया जाता है।

ऐसे बनाते हैं मांदल
मांडू और इसके आसपास के जंगलों में यह विशेष पेड़ पाए जाते हैं। इसे बनाने वाले बुजुर्ग उमरावसिंह ही बचे हैं। उमराव ने अपने दादाजी यह कला सीखी थी। अब वह अपने बेटे को ये कला सिखा रहे हैं। इसे बनाने के लिए भी एक्सपर्ट की जरूरत होती है। जंगलों में घूम कर पेड़ की उम्र जांच कर उसका चयन किया जाता है। फिर पूजा अर्चना कर तना काटने के लिए पेड़ की इजाजत लेनी पड़ती है। इसके बाद उसे गढ़ने का काम शुरू होता है।

तने को पहले अंदर से खोखला किया जाता है, फिर बाहर से उसे गोल शेप देते हैं। काटने से लेकर गढ़ाई तक में 12 दिन लगते हैं। फिर इसे बेल के गोंद में डुबोया जाता है। सूखने रखा जाता है। बकरे के चमड़े को सुखाकर इस पर चढ़ाने के लिए तैयार किया जाता है। 18वें दिन इसकी घिसाई कर मधुमक्खी के छत्ते से बने मोम से पॉलिश की जाती है। फिर रस्सी और चमड़ा कसने के बाद 21वें दिन यह मांदल सुरीली आवाज के लिए तैयार होती है।

क्या होती है 'मांदल '
ट्राइबल एक्सपर्ट चौधरी ने बताया, आदिवासी संस्कृति में लोकभाषा में 'मांदल' का पर्याय 'मांद' वाद्य को कहते हैं। वहीं 'दल' समूह को कहा जाता है। मतलब, मांद पर नाचने वाले दल को मांदल कहा जाता है। इसे खासतौर पर भगोरिया और होली पर उपयोग में लाया जाता है। वहीं, आदिवासी संस्कृति में त्योहारों, शुभ मुहूर्त पर भी मांदल की थाप पर पूरा गांव नाचता है।

कलेक्टर आलोक सिंह का कहना है कि हम इस कलाकार को भी पुरस्कृत करेंगे। प्रदेश के कई अंचलों में इनसे प्रशिक्षण दिलवाएंगे। मैं खुद जाकर इस कला को देखूंगा। ये अच्छी पहल है।

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