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बुधवार, 1 अप्रैल 2020

हम इतिहास के ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जब आना भी दुखदाई है और जाना भी


(ईशमधु तलवार)कविताओं में देसज भाषा और लोकजीवन के जीवंत रंग भरने वाले राजस्थान के अपने किस्म के अनूठे कवि विनोद पदरज की एक कविता ‘देस’ का एक अंश है-
हर कोई बच कर चलता था/ भिंट जाने से डरता था औरतें दूर से ही/औरतों की झोलियों में ठंडी रोटियां डालती थी/फिर भी अस्पताल के बेड पर पड़ा वह मरणासन्न बूढ़ा/चैत होने पर बार-बार अपने बेटे से/ कहता था/ मोकूं घरां ले चाल/गांव का रूंखड़ा देखा

जिसने गांव में अपमान सहा, वह अब अपने जीवन के आखिरी समय में बेटे से फरियाद कर रहा है कि मुझे घर ले चल, गांव के पेड़ दिखा। यह वही पेड़ है जो कोरोना में लोगों को इधर-उधर कर रहा है। ये लोग अपनी धरती, अपना घर देखना चाहते हैं। थैला उठाए पैदल जा रहे लोगों से बात करो तो उनकी आवाज में एक दर्द उभर कर आता है- ‘गांव पहुंच जाएंगे तो हम मरेंगे नहीं। और मरे भी तो अपने देस में तो मरेंगे। इस परदेस में कौन है हमारा?’

इस समय हम इतिहास के ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जब आना भी दुखदाई है और जाना भी। जो बाहर से चलकर अपने शहर जयपुर में आ गए वे अपनी लापरवाही से मर्मान्तक पीड़ा से गुजर रहे हैं। जो जयपुर छोड़कर अपने घर जाना चाहते हैं उनका भी दर्द दिल में टीस बनकर बार-बार उभरता है।

रामगंज में कोरोना घुस गया। यहां एक ही दिन में 10 मरीज मिलने से चिंता बढ़ गई है। रामगंज जयपुर का मुस्लिम बहुल इलाका है, जिसने पारसा कौसरी, मुंशी चांद बिहारी लाल सबा, शमीम जयपुरी और हसरत जयपुरी जैसे शायर दिए हैं। इस समय शहर का यह टुकड़ा कोरोना का दर्द झेल रहा है। बड़ी चौपड़ से लेकर सूरजपोल तक फैले रामगंज में कोई 40,000 से अधिक की आबादी रहती है। ज्यादातर घरों से एक खास किस्म की आवाज सुनाई देती है। यह नगीनों की घिसाई की आवाज है।

घरों में इजराइली मशीनों पर नगीना घिसकर तैयार करने का यह काम ज्यादातर महिलाएं करती हैं। पुरुष इसे बेचने दूसरे देशों में जाते हैं और वहां से खड़ के रूप में कच्चा माल लाते हैं। यहां से 45 वर्षीय व्यक्ति भी इसी काम से ओमान गया था। वह 13 मार्च को घर लौटा तो बीमारी भी साथ ले आया। ‘होम क्वारेंटाइन’ को कहा था, लेकिन वह लोगों से मिलता रहा। नतीजा- झोली से बिखरे नगीनों की तरह बीमारी फैल गई।

गांव में कई भैंसों को खूंटा रास नहीं आता और वह खूंटा उखाड़कर भागती है। हमारे यहां बीमारी से सतर्क करने के लिए डॉक्टर कितनी भी सलाह दें, लेकिन हमने अपनी आजादी के लिए कई जुमले गढ़ रखे हैं, जैसे- ‘कुछ नहीं होता’। यह हल्के-फुल्के और बेजान शब्द भारी कयामत लेकर आते हैं और जान पर बन आती है। रामगंज इसकी मिसाल है।जयपुर में इस समय 2000 लोग ‘होम क्वारेन्टाइन’ में हंै। जाहिर है यह मुश्किल समय है, लेकिन खूंटा उखाड़कर तो नहीं भागा जा सकता। दो पल के जीवन से उम्र ऐसे ही चुरानी पड़ती है।

दूसरी ओर वे लोग हैं जिन्हें उनकी जड़ें बुला रही हैं, लेकिन वे मायूस हैं। प्रतापनगर, सीतापुरा, सांगानेर और अन्य कई बस्तियों में बिहार और यूपी के मजदूर फंसे हैं, जो गांव जाने को तरस गए हैं। सबसे खराब हालत उनकी है, जो भवन निर्माण में लगे थे। ठेकेदार उनकी मजदूरी लेकर भाग गए। अब वे फोन भी नहीं उठाते।धरती जब बुलाती है तो पुकारकर ही बुलाती है। इस सन्नाटे में इस पुकार को वही सुन सकते हैं जिनके दिल में उनका गांव बस्ता है। अज्ञेय के शब्दों में इसे ‘मौन की दहाड़’ कह सकते हैं। पलायन का ऐसे वीभत्स दौर में हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि लीलाधर मंडलोई की कलम से निकला दर्द ताजा कविता के इस अंश में दिखता है-
तब उनके लौटने पर लोक/अपने गीतों के साथ मदमस्त हो उठता था/ अभी वे लाखों-लाख मजबूर और भयाक्रान्त/अपनी बची-खुची गृहस्थी को सिरों पर उठाए/और बच्चों की ज़िंदगी को बचाने का ख़्वाब लिए/बिना गाड़ी-घोड़ा के भाग रहे हैं/वे भाग रहे हैं गिड़गिड़ाते हुए कि उन पर रहम हो/भूखे-प्यासे और बिन पैसों के/डंडे खाते, मुर्गा बनते और उकड़ू मुद्रा में/वे बमुश्किल सही भाग रहे हैं/वे जान बचाने की गरज से भाग रहे हैं/और इस तरह घरों की ओर बेतहाशा भागना/दोस्तों घर लौटना नहीं है!



कोरोना के खौफ में पलायन का दर्द झेल रहे लाखों लोग।


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